विरासत कौन सुनेगा हिमालय की करूण क्रंदन? सुभाष चन्द्र नौटियाल विश्व का तीसरा ध्रुव माने जाने वाला हिमालय मानव की असीमित दोहनकारी नीतियों से कराहा रहा है। अब हिमालय की करूण क्रंदन स्पष्ट सुनायी देने लगी है। मानव के लालच की पराकाष्ठा तथा अति दोहन ने हिमालय को मात्र संसाधनों के दोहन का स्थान मान लिया है। दोहन की बढ़ती इस प्रवृत्ति से सम्पूर्ण मानवीयता खतरे में पड़ चुकी है। यदि मानव की इस दोहनकारी सोच में परिवर्तन नहीं हुआ तो आने वाला समय न सिर्फ हिमालय बल्कि पूरा प्राणी समुदाय का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। नेपाल इस का प्रत्यक्ष तथा ताजा उदाहरण है। इससे पहले भारतीय हिमालयी राज्यों, पाकिस्तान, तिब्बत आदि में भी यह करुण क्रंदन स्पष्ट सुनायी दिया है परन्तु मानव के अति लालची प्रवृत्ति तथा दोहनकारी नीतियों ने अनसुना कर दिया। इसका दुष्परिणाम हिमालयी क्षेत्रों के निवासियों को भुगतना पड़ रहा है। हिमालय विश्व का सबसे बड़ा जल भण्डार माना जाता है। जहां से असंख्य जलधाराएं नदियों के कल्याणकारी स्वरूप में परिवर्तित होकर धरती के असंख्य जीवधारियों का पालन पोषण करते हुए प्रवाहित होती हैं। हिमालय लगभग दो अरब लोगों का पाल्य एवं पोषण कर्ता है। ऐसे में नेपाल सरकार का कहना ठीक ही है कि हिमालय में आने वाली आपदाओं के लिए विकसित देशों की दोहनकारी प्रवृत्ति ही जिम्मेदार है। विकसित देशों द्वारा हिमालयी सम्पदा के अति दोहन से हिमालय वासियों का जीना दुभर हो चुका है। अब समय आ चुका है कि हिमालय वासियों को जलवायु न्याय और मुआवजा मिलना ही चाहिए यह हिमालय वासियों का हक है तथा साथ ही विकसित देशों को हिमालय के दोहन को सीमित करना होगा। भारत में नब्बे के दशक से ही कुछ पर्यावरणविदों द्वारा ग्रीन रायल्टी की मांग की जाती रही है। ग्रीन रायल्टी प्रत्येक हिमालय वासी का अधिकार है। दरअसल वह उन आपदाओं को झेल रहे हैं जिसे उन्होंने पैदा ही नहीं किया है। हिमालय वासी तो सदियों से प्रकृति संरक्षक रहे हैं। यहां के रीति-रिवाज तथा संस्कृति पर्यावरण अनुकूलन रही है। दोहनवादी सोच द्वारा उस संस्कृति को भी ध्वस्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अब नेपाल ने आपदा के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार मानते हुए जलवायु न्याय की मांग कर दी है। नेपाल सरकार का मानना है कि विकसित देशों की अति दोहनकारी प्रवृत्ति से हिमालय सिसक रहा है। जिसे हमने पैदा नहीं किया है। बल्कि विकसित देशों के अति दोहन से यह स्थिति पैदा हुई है। जिसके कारण हिमालयी क्षेत्रों में आपदाएं आ रही हैं। नेपाल ने हाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के लिए बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों से मुआवजे की मांग के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। नेपाल सरकार का कहना है कि देश का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, लेकिन वह ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और चरम मौसमी आपदाओं का गंभीर असर झेल रहा है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल का कहना है कि नेपाल ऐसे संकट की कीमत चुका रहा है, जिसे उसने पैदा नहीं किया। खनाल ने कहा कि नेपाल अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु सहायता को दान के बजाय जलवायु न्याय और मुआवजे के मुद्दे के रूप में उठाएगा। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों को मिलने वाला सहयोग कोई परोपकार नहीं, बल्कि बड़े प्रदूषक देशों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है। वास्तव में यह बात सही है कि केवल नेपाल ही नहीं बल्कि 24 करोड़ हिमालयवासी उन आपदाओं की मार झेल रहे हैं जिसे उन्होंने पैदा ही नहीं किया बल्कि विकसित देशों ने अपने लाभ के लिए हिमालयी क्षेत्रों में यह विकट स्थिति पैदा कर दी है। जिसकी जिम्मेदारी भी विकसित देशों की ही बनती है। हिमालय राजनीति देश की सीमाओं से बंधा नहीं है। यदि मानव सभ्यता को बचाना है तो हिमालयी सम्पदा को अति दोहन से बचाने की आवश्यकता है साथ ही हिमालयी संस्कृति बोली-भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति, मानव समाज तथा सम्पदा के संरक्षण की आवश्यकता है। आज हिमालय को राजनीतिक सीमाओं के बजाय सम्पूर्ण हिमालय के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें पाकिस्तान, भारत, तिब्बत, नेपाल, भूटान सहित अफगानिस्तान तथा म्यांमार को भी शामिल किया जा सकता। हिमालय केवल बर्फ का घर मात्र नहीं है बल्कि मानव सहित, जैवविविधता का घर, प्राणी समुदाय का आश्रयदाता एवं पोषण कर्ता भी है। अब समय आ गया है कि, मानव सहित समस्त प्राणी की जीवन रक्षा के लिए हिमालय से उठने वाले करुण क्रंदन को समय रहते महसूस किया जाए ताकि सम्पूर्ण प्राणी समुदाय सहित मानव को एक स्वस्थ, समृद्ध तथा दीर्घ जीवन प्राप्त हो। 05/10/ 2026
कौन सुनेगा हिमालय की करुण क्रंदन
यदि मानव सभ्यता को बचाना है तो हिमालयी सम्पदा को अति दोहन से बचाने की आवश्यकता है साथ ही हिमालयी संस्कृति बोली-भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति, मानव समाज तथा सम्पदा के संरक्षण की आवश्यकता है। आज हिमालय को राजनीतिक सीमाओं के बजाय सम्पूर्ण हिमालय के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें पाकिस्तान, भारत, तिब्बत, नेपाल, भूटान सहित अफगानिस्तान तथा म्यांमार को भी शामिल किया जा सकता।
कौन सुनेगा हिमालय की करूण क्रंदन?
सुभाष चन्द्र नौटियाल
विश्व का तीसरा ध्रुव माने जाने वाला हिमालय मानव की असीमित दोहनकारी नीतियों से कराहा रहा है। अब हिमालय की करूण क्रंदन स्पष्ट सुनायी देने लगी है। मानव के लालच की पराकाष्ठा तथा अति दोहन ने हिमालय को मात्र संसाधनों के दोहन का स्थान मान लिया है। दोहन की बढ़ती इस प्रवृत्ति से सम्पूर्ण मानवीयता खतरे में पड़ चुकी है। यदि मानव की इस दोहनकारी सोच में परिवर्तन नहीं हुआ तो आने वाला समय न सिर्फ हिमालय बल्कि पूरा प्राणी समुदाय का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।
नेपाल इस का प्रत्यक्ष तथा ताजा उदाहरण है। इससे पहले भारतीय हिमालयी राज्यों, पाकिस्तान, तिब्बत आदि में भी यह करुण क्रंदन स्पष्ट सुनायी दिया है परन्तु मानव के अति लालची प्रवृत्ति तथा दोहनकारी नीतियों ने अनसुना कर दिया। इसका दुष्परिणाम हिमालयी क्षेत्रों के निवासियों को भुगतना पड़ रहा है। हिमालय विश्व का सबसे बड़ा जल भण्डार माना जाता है। जहां से असंख्य जलधाराएं नदियों के कल्याणकारी स्वरूप में परिवर्तित होकर धरती के असंख्य जीवधारियों का पालन पोषण करते हुए प्रवाहित होती हैं। हिमालय लगभग दो अरब लोगों का पाल्य एवं पोषण कर्ता है। ऐसे में नेपाल सरकार का कहना ठीक ही है कि हिमालय में आने वाली आपदाओं के लिए विकसित देशों की दोहनकारी प्रवृत्ति ही जिम्मेदार है। विकसित देशों द्वारा हिमालयी सम्पदा के अति दोहन से हिमालय वासियों का जीना दुभर हो चुका है। अब समय आ चुका है कि हिमालय वासियों को जलवायु न्याय और मुआवजा मिलना ही चाहिए यह हिमालय वासियों का हक है तथा साथ ही विकसित देशों को हिमालय के दोहन को सीमित करना होगा। भारत में नब्बे के दशक से ही कुछ पर्यावरणविदों द्वारा ग्रीन रायल्टी की मांग की जाती रही है। ग्रीन रायल्टी प्रत्येक हिमालय वासी का अधिकार है। दरअसल वह उन आपदाओं को झेल रहे हैं जिसे उन्होंने पैदा ही नहीं किया है। हिमालय वासी तो सदियों से प्रकृति संरक्षक रहे हैं। यहां के रीति-रिवाज तथा संस्कृति पर्यावरण अनुकूलन रही है। दोहनवादी सोच द्वारा उस संस्कृति को भी ध्वस्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
अब नेपाल ने आपदा के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार मानते हुए जलवायु न्याय की मांग कर दी है। नेपाल सरकार का मानना है कि विकसित देशों की अति दोहनकारी प्रवृत्ति से हिमालय सिसक रहा है। जिसे हमने पैदा नहीं किया है। बल्कि विकसित देशों के अति दोहन से यह स्थिति पैदा हुई है। जिसके कारण हिमालयी क्षेत्रों में आपदाएं आ रही हैं।
नेपाल ने हाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के लिए बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों से मुआवजे की मांग के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। नेपाल सरकार का कहना है कि देश का वैश्विक उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, लेकिन वह ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और चरम मौसमी आपदाओं का गंभीर असर झेल रहा है।
विदेश मंत्री शिशिर खनाल का कहना है कि नेपाल ऐसे संकट की कीमत चुका रहा है, जिसे उसने पैदा नहीं किया। खनाल ने कहा कि नेपाल अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु सहायता को दान के बजाय जलवायु न्याय और मुआवजे के मुद्दे के रूप में उठाएगा। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों को मिलने वाला सहयोग कोई परोपकार नहीं, बल्कि बड़े प्रदूषक देशों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है।
वास्तव में यह बात सही है कि केवल नेपाल ही नहीं बल्कि 24 करोड़ हिमालयवासी उन आपदाओं की मार झेल रहे हैं जिसे उन्होंने पैदा ही नहीं किया बल्कि विकसित देशों ने अपने लाभ के लिए हिमालयी क्षेत्रों में यह विकट स्थिति पैदा कर दी है। जिसकी जिम्मेदारी भी विकसित देशों की ही बनती है। हिमालय राजनीति देश की सीमाओं से बंधा नहीं है।
यदि मानव सभ्यता को बचाना है तो हिमालयी सम्पदा को अति दोहन से बचाने की आवश्यकता है साथ ही हिमालयी संस्कृति बोली-भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति, मानव समाज तथा सम्पदा के संरक्षण की आवश्यकता है। आज हिमालय को राजनीतिक सीमाओं के बजाय सम्पूर्ण हिमालय के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें पाकिस्तान, भारत, तिब्बत, नेपाल, भूटान सहित अफगानिस्तान तथा म्यांमार को भी शामिल किया जा सकता। हिमालय केवल बर्फ का घर मात्र नहीं है बल्कि मानव सहित, जैवविविधता का घर, प्राणी समुदाय का आश्रयदाता एवं पोषण कर्ता भी है। अब समय आ गया है कि, मानव सहित समस्त प्राणी की जीवन रक्षा के लिए हिमालय से उठने वाले करुण क्रंदन को समय रहते महसूस किया जाए ताकि सम्पूर्ण प्राणी समुदाय सहित मानव को एक स्वस्थ, समृद्ध तथा दीर्घ जीवन प्राप्त हो।